......मुझमें फिल्मों में जाने की नींव .....सन सत्तावन (५७)में ही
पड़ गयी ,जब मैं सातवीं क्लास में पढ़ रहा था ....और साथ मिला
दोस्त रतन का .........फिल्म देखने की आदत पड़ चुकी थी .....घर
के बगल ,रेलवे स्टेशन के ही करीब ......सुदर्शन टाकीज था ...अब भी
है ......जिसमें चालीस नये पैसे में सबसे आगे का टिकट मिल जाता था
परदे के बिल्कुल करीब बैठ के फिल्म देखते थे ......
........चोरी चोरी ,तुमसा नहीं देखा ,.......नदिया के पार ,....
दुर्गेश नंदनी .....बहुत सारी फ़िल्में यहीं ....देखा .....यह सारा काम ,घर
वालों से छुपा कर करता था ...घर से तीन -चार घंटे के लिए गायब होना
मुश्किल होता था .....और पकडे जान के बाद डांट खाना पड़ता था ......
राजू नाम का एक लडका था .....मुझ से उम्र में बड़ा था .......डांट खाने से
बचने का एक रास्ता सुझाया उसने ........फिल्म कैसे देखी जाय ?....उसने कहा
हम में से एक ....फिल्म का टिकट ले कर के आये .....और इंटरवल तक फिल्म
देखे ......और इंटरवल के बाद की फिल्म राजू देखे .....बाद में मिल कर कहानी
एक दुसरे को सूना लें ......घर पे भी पकडे नहीं जायेगें और पैसे भी कम लगे गा
आधे पैसे में फिल्म देख लेगें ..........
और हम दोनों मिल कर फ़िल्में देखने लगे ........राजू के मौसा जी मुम्बई में फिल्म
निर्माता और निर्देशक थे ........जिनका नाम राजेन्द्र भाटिया था ......जिन्होंने अनपढ़
फिल्म बनाई थी ....और भी फ़िल्में बनाई थी ...
जब मैं मुम्बई आया ......एक दिन,राजेन्द्र भाटिया जी के बेटे से मुलाक़ात हुई
जो राज .यन .सिप्पी का सहायक था ........
मैं जब गाँव जाता .....अपनी दादी से कहता, मैं फिल्मों में जाउंगा और ढेर
सारा पैसा कमाऊँगा ........मेरे साथ जो लडके थे सारे के सारे हाई स्कूल में फेल हो गये थे
बाबूजी ने कह दिया था ....यह सब खेल -कूद बंद करो ....वरना कोई नौकरी नहीं मिलने वाली
.......सच में मेरा खेलना कूदना बंद हो गया .......हाई स्कूल सेकण्ड डीविजन में पास हो गया
बाबू जी इतना खुश .....उनकी खुशी देखते बनती थी .....
रेलवे के कर्मचारिओं के बेटों के लिए एक कैम्प जा रहा था कश्मीर .......
सिर्फ पंद्रह रूपये में .......मैं कश्मीर गया सन ६२ में .....वहीं मैंने पहली बार एक्टर ओमप्रकाश जी
से मिला ...जब हम लडके लोग निशात बाग़ में घूम रहे थे .......हमारे साथ ....लाला अमरनाथ जी
आये थे दिल्ली से .....मैं तब -तक लाला जी बारे में कुछ नहीं जानता था .....उनकी ही पहचान थी
ओमप्रकाश जी से .......उन्हीं ने हम लडको को मिलवाया था ........जब मैं मुम्बई आया तो
ओमप्रकाश जी का आफिस रूप तारा स्टूडियो में .था , मेरे निर्माता विकाश जी का भी आफिस था
वहीं और उन्होंने ही मिलवाया था .......ओमजी .....से जब मिला ....और उन्हें कश्मीर की बात की
पर .....उन्हें याद नहीं थी .....
Tuesday, June 1, 2010
हजपुरा
सन ५२ था ,और मैं दूसरी क्लास में था ,घर से बहुत नजदीक था स्कूल
पैदल ही मैं जाता था ...मेरे साथ ...रिफूजी बैरेक में रहने वाले वह
लडके भी थे .....जो बंटवारे के बाद ,यहाँ रहने के लिए उन्हें
घर मिला था ....मेरा साथ पंजाबी लडकों के साथ बीतता .....
हर परिवार के पास एक कहानी थी ....कैसे अपना सब कुछ छोड़ के
हिदुस्तान आये ....तीसरी क्लाश में पहुँचते ...मेरे सारे दोस्त पंजाबी
लडके हो गये ....सभी पंजाबी बोलते, सभी खूब बदमासी करते ...यह सारे
गुण मुझ में भी आ गये .....खेलते बहुत थे ,घर के बगल टीन ग्राउंड था ...
जहाँ पर सारे खेल, खेले जाते थे ....मैं भी सारे खेल खेलता .....देख -देख कर
हम लडके भी सीख जाते ,और उनकी नक़ल कर के हम बड़े होने लगे
स्कूल की की जब भी ...छुट्टी होती ...मैं अपने गाँव चल देता
जहाँ मेरे दोस्त मेरा इन्तजार करते ....गरमी की छुट्टी होती, तो दो महीने
गाँव रहता ....दिन भर आम की बाग़ में घूमना .....लडकों के साथ लखनी
खेलना ....शाम होते ही ....दादी से डांट खाना ...कपडे गंदे हो जाते ....घर में
हैण्ड पाईप से नहाना .....और पानी इतना ठंडा होता ,की एक बाल्टी से ज्यादा नहा
ही नहीं पाते .....शहर में बिजली थी ....यहाँ लालटेन .....मैं शाम को तीनों लालटेन
को साफ़ करना ...उसमें मिटटी का तेल भरना ....और सब को जला देना ,मेरी इस
आदत से दादी बहुत खुश होती .....
कच्चे आम खा कर दांत इतने खट्टे हो जाते की खाना ठीक से खाया नहीं जाता
दादी इस बात से बहुत गुस्सा करती ....दो महीना बीते -बीते पता नहीं चलता ...और मुझे
पढने के लिए लखनऊ जाना पड़ता .......
फिर से पढाई शुरू ....जो सब ,अच्छा नहीं लगता .....मुझे .....मेरा मन खेती
करने में जादा लगता था....मैं पढाई से जी चुराता था ....पिता जी डांट खाना .....मैं पिता जी
और दो चाचा लोगों में ऐसा फंस गया की मुझे पढना ही पड़ता था .....इन सब से एक
फायदा हुआ ....मेरी पढाई भी अच्छी हो गयी ....और खेलने में भी अव्वल हो गया
क्लास सात में जब पहुंचा .....पहली बार मेरे स्कूल ने लखनऊ रीजन में जूनियर रेस
में मुझे भी अपने स्कूल की तरफ से भेजा गया .....मैंने आठ सौ गज की दौड़ में भाग लिया
और मै सेकण्ड आया ....इसके बाद पन्द्रह सौ गज की रेश हुई ......उसमें भी मै सेकण्ड आया
मेरे टीचर ने मुझे अपने कंधे पे उठा लिया .......और दुसरे दिन मेरा नाम लखनऊ से
निकलने वाले पेपर स्वतंत्र भारत में नाम निकला .....जिसे देख कर मेरे पिता पहली बार बहुत खुश
हुए ........आज जब मैं अपने बचपन की बाते बताता हूँ .....तो बताते समय, मैं कहता हूँ जब
मैं सातवीं क्लास में था ..........मेरे बच्चे मेरा मजाक करते हैं, पापा जब आप सातवीं क्लास
में थे तभी आप ने सब कुछ किया था ....
पहली बार , सातवीं क्लास में मैं फेल हुआ था ....सातवीं क्लास में ही मेरा बायाँ हाथ फरेक्चर हुआ था....... । सन ५७ में ही नये पैसे चलना शुरू हुआ था ....कनेडियन स्टीम इंजन भी ५७ में आया था
हमारे घर के सामने ,रहने वाले सेवादास ,मेरा हाथ देसी तरीके से बैठाने लगे .....वह दर्द का
मंजर आज भी मुझे याद है .....सन सत्तावन में मैं सातवीं क्लास में था .....मैंने सातवीं क्लास
दो बार पढ़ी .....दूसरी बार मुझे मिला ....मेरा दोस्त रतन ......जो मेरे जीवन में मुम्बई तक साथ
आया .....दोस्त तो बहुत थे ,पर जो बात रतन में थी ......वह किसी दोस्त में नहीं थी ...
मैं सातवीं क्लास से फिल्मी बातें करने लगा .....सब से पीछी वाली सीट पे बैठना ....और पढाई
से जी चुराने लगा ....कहानी सुनना और सुनाना होता .....टीचर मुझे मानते थे ,मैंने स्पोर्ट्स
में मैंने कान्यकुब्ज वोकेशनल स्कूल का नाम किया था
मैं फ़ुटबाल भी बहुत अच्छा खेलता था ..........सन सत्तावन में फिल्म मुगले आज़म रिलीज
हुई थी .....बच्चे तो बच्चे होते हैं ...मैं मुस्करा के ...चुप हो जाता
पैदल ही मैं जाता था ...मेरे साथ ...रिफूजी बैरेक में रहने वाले वह
लडके भी थे .....जो बंटवारे के बाद ,यहाँ रहने के लिए उन्हें
घर मिला था ....मेरा साथ पंजाबी लडकों के साथ बीतता .....
हर परिवार के पास एक कहानी थी ....कैसे अपना सब कुछ छोड़ के
हिदुस्तान आये ....तीसरी क्लाश में पहुँचते ...मेरे सारे दोस्त पंजाबी
लडके हो गये ....सभी पंजाबी बोलते, सभी खूब बदमासी करते ...यह सारे
गुण मुझ में भी आ गये .....खेलते बहुत थे ,घर के बगल टीन ग्राउंड था ...
जहाँ पर सारे खेल, खेले जाते थे ....मैं भी सारे खेल खेलता .....देख -देख कर
हम लडके भी सीख जाते ,और उनकी नक़ल कर के हम बड़े होने लगे
स्कूल की की जब भी ...छुट्टी होती ...मैं अपने गाँव चल देता
जहाँ मेरे दोस्त मेरा इन्तजार करते ....गरमी की छुट्टी होती, तो दो महीने
गाँव रहता ....दिन भर आम की बाग़ में घूमना .....लडकों के साथ लखनी
खेलना ....शाम होते ही ....दादी से डांट खाना ...कपडे गंदे हो जाते ....घर में
हैण्ड पाईप से नहाना .....और पानी इतना ठंडा होता ,की एक बाल्टी से ज्यादा नहा
ही नहीं पाते .....शहर में बिजली थी ....यहाँ लालटेन .....मैं शाम को तीनों लालटेन
को साफ़ करना ...उसमें मिटटी का तेल भरना ....और सब को जला देना ,मेरी इस
आदत से दादी बहुत खुश होती .....
कच्चे आम खा कर दांत इतने खट्टे हो जाते की खाना ठीक से खाया नहीं जाता
दादी इस बात से बहुत गुस्सा करती ....दो महीना बीते -बीते पता नहीं चलता ...और मुझे
पढने के लिए लखनऊ जाना पड़ता .......
फिर से पढाई शुरू ....जो सब ,अच्छा नहीं लगता .....मुझे .....मेरा मन खेती
करने में जादा लगता था....मैं पढाई से जी चुराता था ....पिता जी डांट खाना .....मैं पिता जी
और दो चाचा लोगों में ऐसा फंस गया की मुझे पढना ही पड़ता था .....इन सब से एक
फायदा हुआ ....मेरी पढाई भी अच्छी हो गयी ....और खेलने में भी अव्वल हो गया
क्लास सात में जब पहुंचा .....पहली बार मेरे स्कूल ने लखनऊ रीजन में जूनियर रेस
में मुझे भी अपने स्कूल की तरफ से भेजा गया .....मैंने आठ सौ गज की दौड़ में भाग लिया
और मै सेकण्ड आया ....इसके बाद पन्द्रह सौ गज की रेश हुई ......उसमें भी मै सेकण्ड आया
मेरे टीचर ने मुझे अपने कंधे पे उठा लिया .......और दुसरे दिन मेरा नाम लखनऊ से
निकलने वाले पेपर स्वतंत्र भारत में नाम निकला .....जिसे देख कर मेरे पिता पहली बार बहुत खुश
हुए ........आज जब मैं अपने बचपन की बाते बताता हूँ .....तो बताते समय, मैं कहता हूँ जब
मैं सातवीं क्लास में था ..........मेरे बच्चे मेरा मजाक करते हैं, पापा जब आप सातवीं क्लास
में थे तभी आप ने सब कुछ किया था ....
पहली बार , सातवीं क्लास में मैं फेल हुआ था ....सातवीं क्लास में ही मेरा बायाँ हाथ फरेक्चर हुआ था....... । सन ५७ में ही नये पैसे चलना शुरू हुआ था ....कनेडियन स्टीम इंजन भी ५७ में आया था
हमारे घर के सामने ,रहने वाले सेवादास ,मेरा हाथ देसी तरीके से बैठाने लगे .....वह दर्द का
मंजर आज भी मुझे याद है .....सन सत्तावन में मैं सातवीं क्लास में था .....मैंने सातवीं क्लास
दो बार पढ़ी .....दूसरी बार मुझे मिला ....मेरा दोस्त रतन ......जो मेरे जीवन में मुम्बई तक साथ
आया .....दोस्त तो बहुत थे ,पर जो बात रतन में थी ......वह किसी दोस्त में नहीं थी ...
मैं सातवीं क्लास से फिल्मी बातें करने लगा .....सब से पीछी वाली सीट पे बैठना ....और पढाई
से जी चुराने लगा ....कहानी सुनना और सुनाना होता .....टीचर मुझे मानते थे ,मैंने स्पोर्ट्स
में मैंने कान्यकुब्ज वोकेशनल स्कूल का नाम किया था
मैं फ़ुटबाल भी बहुत अच्छा खेलता था ..........सन सत्तावन में फिल्म मुगले आज़म रिलीज
हुई थी .....बच्चे तो बच्चे होते हैं ...मैं मुस्करा के ...चुप हो जाता
Thursday, May 20, 2010
हजपुरा
......गाँव में मेरा बचपना छे साल तक बीता...पढ़ाई के लिए ,मुझे
पिता जी , लखनऊ शहर ले आये .....मैं आकेला ही आया ,माँ
गाँव में ही रह गयी ......यह दौर था सन ५१ का ......पिता जी को
स्टेशन के पास रेलवे कालोनी में घर मिल गया था ......दो कमरे थे
एक किचन था ,किचन से लगा वरांडा.....घर स्टेशन से लगा हुआ था
मैं सुबह ही पिता जी के साथ ...उनके आफिस चला जाता .....लखनऊ
स्टेशन के एक नम्बर प्लेट फ़ार्म पे कैश-आफिस था रेलवेका .....जहां
पिता जी एक कैशियर वतौर काम करते थे ....
नाम मेरा अभी तक कहीं नहीं लिखा गया था ......मैं स्टेशन पे घूमा करता
पढाई के नाम पे कुछ नहीं था ......एक नम्बर प्लेट फ़ार्म पे माल गोदाम था ......मैं
घूमते -घूमते ,जब वहाँ पहुंचता .....माल गोदाम का बाबु मुझे जानता था की मैं
मिसरा जी का लडका हूँ ......जिस भी फल का सीजन होता .....वह फल जरुर खिलाता
......जाते -जाते दो -चार फल दे देता था ...
उस समय .....पिता जी सुबह ही खाना बना देते ....मैं और पिता जी सुबह
दस बजे ही खा लेते थे .......लंच नाम की कोई चीज नहीं थी ........शाम को पिता जी मुझे
चारबाग में ही जलपान नाम का एक बंगाली रेस्टोरेंट था .....शायद अब भी है ....उसके थोड़ा
आगे एक दूध की दूकान थी पंडित जी की ......उस पे सिर्फ दूध और दही ही मिलता था ...पिता जी
मुझे जबर्दस्ती दूध पिलाते थे .....फिर घर आ कर चूल्हे ...पे खाना बनाते थे ......कुछ महीने बाद
मेरे छोटे चाचा भी .....पढने के लिए लखनऊ आ गये ......तब वह क्लाश आठ में थे ....
मेरा नाम .....छित्वापुर स्टेशन रोड पे है ....वहीं पे एक गली है ,सरकारी स्कूल है एक,
वहीं मेरा नाम पहली बार लिखाया गया .....हमारे क्वाटर के बगल से भी एक लड़का वहीं पढ़ता
था ,जिसके साथ मैं जाता था .....
मैं महीना भर गया हूंगा ......फिर उसके बाद मेरा नाम रेलवे के स्कूल में लिखा दिया
गया ....एक आश्चर्य की बात बताता हूँ ....जिस स्कूल में मैं ,पहली बार गया था ....उसी के बगल
वाले मकान में ....ससुराल मेरी है ......उस समय मेरी पत्नी शायद पैदा नहीं हुई थी .....
रेलवे के स्कूल में मैं .......कुल महीना भर गया हूंगा .......एक कुत्ते ने दौड़ाया ....और मैं
नाली में गिर गया ...हाथ -पैर में चोट लगी .......बस वही ...मेरा आखरी दिन था उस स्कूल का
........माँ गाँव से आ गयी ........सन ५२ में मेरा नाम कान्यकुब्ज वोकेशनल में लिखा दिया गया
.......और मै क्लाश १२ तक यहीं पढ़ा .....नाम लिखने के बाद से ......मेरे पिता जी कभी भी मेरे
स्कूल नहीं आये .......
वैसे मेरा नाम भी क्लाश दो में लिखा दिया गया ...पहली क्लाश मैंने पढ़ी ही नहीं
क्लास का पहला दिन मुझे आज तक याद है ....मेरी माँ मुझसे मिलने आयीं थी ...एक बड़ा सा
अमरुद ले कर ......उसकी मिठास आज भी मेरी जबान पे है ....उन टीचर की शक्ल भी मुझे
याद है ......इसी क्लाश में मेरा पहला दोस्त बना ....सुभाष भंडारी ....उसके पिता मिलेट्री में
थे ....
पिता जी , लखनऊ शहर ले आये .....मैं आकेला ही आया ,माँ
गाँव में ही रह गयी ......यह दौर था सन ५१ का ......पिता जी को
स्टेशन के पास रेलवे कालोनी में घर मिल गया था ......दो कमरे थे
एक किचन था ,किचन से लगा वरांडा.....घर स्टेशन से लगा हुआ था
मैं सुबह ही पिता जी के साथ ...उनके आफिस चला जाता .....लखनऊ
स्टेशन के एक नम्बर प्लेट फ़ार्म पे कैश-आफिस था रेलवेका .....जहां
पिता जी एक कैशियर वतौर काम करते थे ....
नाम मेरा अभी तक कहीं नहीं लिखा गया था ......मैं स्टेशन पे घूमा करता
पढाई के नाम पे कुछ नहीं था ......एक नम्बर प्लेट फ़ार्म पे माल गोदाम था ......मैं
घूमते -घूमते ,जब वहाँ पहुंचता .....माल गोदाम का बाबु मुझे जानता था की मैं
मिसरा जी का लडका हूँ ......जिस भी फल का सीजन होता .....वह फल जरुर खिलाता
......जाते -जाते दो -चार फल दे देता था ...
उस समय .....पिता जी सुबह ही खाना बना देते ....मैं और पिता जी सुबह
दस बजे ही खा लेते थे .......लंच नाम की कोई चीज नहीं थी ........शाम को पिता जी मुझे
चारबाग में ही जलपान नाम का एक बंगाली रेस्टोरेंट था .....शायद अब भी है ....उसके थोड़ा
आगे एक दूध की दूकान थी पंडित जी की ......उस पे सिर्फ दूध और दही ही मिलता था ...पिता जी
मुझे जबर्दस्ती दूध पिलाते थे .....फिर घर आ कर चूल्हे ...पे खाना बनाते थे ......कुछ महीने बाद
मेरे छोटे चाचा भी .....पढने के लिए लखनऊ आ गये ......तब वह क्लाश आठ में थे ....
मेरा नाम .....छित्वापुर स्टेशन रोड पे है ....वहीं पे एक गली है ,सरकारी स्कूल है एक,
वहीं मेरा नाम पहली बार लिखाया गया .....हमारे क्वाटर के बगल से भी एक लड़का वहीं पढ़ता
था ,जिसके साथ मैं जाता था .....
मैं महीना भर गया हूंगा ......फिर उसके बाद मेरा नाम रेलवे के स्कूल में लिखा दिया
गया ....एक आश्चर्य की बात बताता हूँ ....जिस स्कूल में मैं ,पहली बार गया था ....उसी के बगल
वाले मकान में ....ससुराल मेरी है ......उस समय मेरी पत्नी शायद पैदा नहीं हुई थी .....
रेलवे के स्कूल में मैं .......कुल महीना भर गया हूंगा .......एक कुत्ते ने दौड़ाया ....और मैं
नाली में गिर गया ...हाथ -पैर में चोट लगी .......बस वही ...मेरा आखरी दिन था उस स्कूल का
........माँ गाँव से आ गयी ........सन ५२ में मेरा नाम कान्यकुब्ज वोकेशनल में लिखा दिया गया
.......और मै क्लाश १२ तक यहीं पढ़ा .....नाम लिखने के बाद से ......मेरे पिता जी कभी भी मेरे
स्कूल नहीं आये .......
वैसे मेरा नाम भी क्लाश दो में लिखा दिया गया ...पहली क्लाश मैंने पढ़ी ही नहीं
क्लास का पहला दिन मुझे आज तक याद है ....मेरी माँ मुझसे मिलने आयीं थी ...एक बड़ा सा
अमरुद ले कर ......उसकी मिठास आज भी मेरी जबान पे है ....उन टीचर की शक्ल भी मुझे
याद है ......इसी क्लाश में मेरा पहला दोस्त बना ....सुभाष भंडारी ....उसके पिता मिलेट्री में
थे ....
Wednesday, May 19, 2010
हजपुरा
....मैं उन यादों को लिख रहा हूँ .....जो मेरे बचपने की वह हैं .......जिनसे
मेरे जीवन का रूप -रंग बदला ....मेरी माँ पे ....देवी माँ का साया था .....जब उन पर आता था
तब वह क्या क्या बोलती थी ......मुझे याद नहीं है ....पर वह भय...आज तक ,
मेरे अंदर छिपा बैठा है कहीं ......जब माँ ...नार्मल होती ....तब वह बहुत थकी
होती थी ....
मेरी दादी ....मुझे बहुत प्यार करती थी .....हमारे गाँव में किसी की
मौत हो गयी थी .....मैं भी जिद्द कर के चला गया था .....पहली बार किसी मरे हुए
इंसान को देखा था ....पर वह सब मेरी समझ में कुछ नहीं आया था ......मुझ में
एक आदत थी .....घर की किसी चीज को मैं ,घर के बगल जो कुआं था ....उस में फेंक
देता था ....घर की लालटेन तक फेंक दिया था ......पर मुझे डांट नहीं पडती थी ...घर का
नौकर (हरवाह ) भोला ......कुएं में घुसता और लालटेन निकाल के लाता था .......
हमारे गाँव के घर में ....चार बैल थे ....जिनसे खेती होती थी ...दो भैंस और एक जर्सी
गाय होती थी ......सुबह चरवाहा आता ....गाय और भैंस को चराने के लिए ले जाता था
.....अक्सर मैं भी उस चरवाहे के साथ जाता था ....वह मुझे किसी एक भैस पे बिठा देता
और गाँव के बाहर तक जाता ....आज जब उन घटनाओं को याद करता हूँ .....तो मुझे कान्हा
का लड़कपन याद आता है .....
बरसात के दिनों में ...गाँव के आस -पास छोटे - छोटे तलाब जो होते थे
पानी से भर जाया करते थे ......मैं अपने दोस्तों के साथ .....इन तलाबो में जाता और
तैरना सीखता था .....पानी के ऊपर एक कीड़ा बहुत तेजी से तैरता था ....जिन्हें हम सभी
भंवरा कहते थे .....दोस्त कहते थे ,इन्हें पकड के पानी के साथ पी जाएँ तो ....तैरना जल्दी
सीख जायेंगें .......यह सच है या गलत ....पर धीरे -धीरे मैं तैरना सीख गया ....
बरसात के दिनों में ....हम सभी लडके कुस्ती लड़ने का अभ्यास करते थे ....दुसरे
गाँव का एक नट आता जो हम लडकों को कुस्ती के दावं सिखाता था ......उसको दो वक्त का
खाना मिलता .....और दो महीने के बाद जब जाता .....तब उसे हर घर से अनाज मिलता ...
जिसे वह ,अपने घर ले के जाता था ......मैं बचपने में बहुत तगड़ा था ......अपने दोस्तों को
कुस्ती में हरा देता था ......इसी वजह से मेरे काफी दोस्त बन गये थे ........जो आज तक हैं
आज भी जब गाँव जाता .....सभी मिलते और उस बचपने को याद कर के खूब मजा लेते ...
भागु मेरा सबसे प्रिय दोस्त था .....आज भी वह मेरा दोस्त है .......उसके बाद ,
हिरदय मणि मेरे दोस्त थे ......गाँव में आज उनका एक कालेज है ...जिसके वह प्रिंसपल हैं
फिर राधे का नाम आता है ......हम दोनों बचपन में करेमुं नाम का एक पौधा ...जिसे शहरों
में नारी का साग कहते हैं ...तोड़ने किराहिया नाम का एक तलाब था ,जिसमें जाते थे .....
हम दोनों अपने कपडे उतार के ....तलाब के किनारे रख देते थे ,फिर उस तलाब में उतरते ...
नहाते हुए ....करेमुं का साग तोड़ते ......
आज राधे श्याम मुम्बई शहर में टैक्सी चलाते हैं .......हम लोगों का एक और दोस्त है ,जो
गाँव के कहांर का लडका है ....नाम सुरेस है ......बचपने में हम लोगों को जब दुसरे गाँव से पूड़ी की
दावत मिलती ....यह दावते अक्सर हम पंडितों को मिलती थी .....और रात को यह दावत
होती थी .....हम दोस्त सुरेस को अपने साथ ले लेते थे ....जो जात का पंडित नहीं है ....हम जब
पांत में बैठते ....उसे भी अपने बगल बिठा लेते .....उसके गले में एक जनेऊ डाल देते ,जिससे कोई
उसे ना पहचान नहीं सके ......दोस्तों में यह मेरी जिद्द का नतीजा होता ....सुरेश भी १४ से १५ साल
की उम्र में मुम्बई आ गया था ......एक पान की दूकान पे काम करता था ...कमाठीपुरा में .....२३ या
२४ उम्र में कहीं गायब हो गया .....दस से पंद्रह साल बीत गया ......पत्नी अपने दो बच्चों को ले कर
अपने गाँव चली गयी ...
फिर कई सालों बाद वह अपने गाँव आ गया .......जो उसने बताया वह कमाल का था
उसे मुम्बई में कोई साहब मिले .....जो इसको जर्मनी ले कर गया .....और इतने सालों तक वहीं ही
रहा ...जब मैंने उससे पूछा ....चिट्ठी क्यों नहीं लिखा घर में ......जो उसने बताया .....वह बहुत
अजीब है .....यह उनकी कैद में था ....घर से बाहर तक नहीं निकल सकता था ...
यह कहाँ तक सच है .....मुझे नहीं मालूम ......कुछ साल घर रहा .....फिर मुम्बई आया
और फिर से गायब हो गया .......इसकी पत्नी बच्चे अकेले हो गये ,फिर से ....इसके बेटे को .....
मेरे भाई लखनऊ ले आये ......और हमारे घर पे रहने लगा ....आज वह, यम .बी .एय .कर रहा है
पिता का पता नहीं ,फिर से इस मुम्बई में खो गया ...वह.........!
...
कुछ लोग कहते हैं , वह मछुहारों के मोहल्ले में रहता है .....एक शादी कर ली है ...क्या सच है ...
नहीं मालूम .....
मेरे जीवन का रूप -रंग बदला ....मेरी माँ पे ....देवी माँ का साया था .....जब उन पर आता था
तब वह क्या क्या बोलती थी ......मुझे याद नहीं है ....पर वह भय...आज तक ,
मेरे अंदर छिपा बैठा है कहीं ......जब माँ ...नार्मल होती ....तब वह बहुत थकी
होती थी ....
मेरी दादी ....मुझे बहुत प्यार करती थी .....हमारे गाँव में किसी की
मौत हो गयी थी .....मैं भी जिद्द कर के चला गया था .....पहली बार किसी मरे हुए
इंसान को देखा था ....पर वह सब मेरी समझ में कुछ नहीं आया था ......मुझ में
एक आदत थी .....घर की किसी चीज को मैं ,घर के बगल जो कुआं था ....उस में फेंक
देता था ....घर की लालटेन तक फेंक दिया था ......पर मुझे डांट नहीं पडती थी ...घर का
नौकर (हरवाह ) भोला ......कुएं में घुसता और लालटेन निकाल के लाता था .......
हमारे गाँव के घर में ....चार बैल थे ....जिनसे खेती होती थी ...दो भैंस और एक जर्सी
गाय होती थी ......सुबह चरवाहा आता ....गाय और भैंस को चराने के लिए ले जाता था
.....अक्सर मैं भी उस चरवाहे के साथ जाता था ....वह मुझे किसी एक भैस पे बिठा देता
और गाँव के बाहर तक जाता ....आज जब उन घटनाओं को याद करता हूँ .....तो मुझे कान्हा
का लड़कपन याद आता है .....
बरसात के दिनों में ...गाँव के आस -पास छोटे - छोटे तलाब जो होते थे
पानी से भर जाया करते थे ......मैं अपने दोस्तों के साथ .....इन तलाबो में जाता और
तैरना सीखता था .....पानी के ऊपर एक कीड़ा बहुत तेजी से तैरता था ....जिन्हें हम सभी
भंवरा कहते थे .....दोस्त कहते थे ,इन्हें पकड के पानी के साथ पी जाएँ तो ....तैरना जल्दी
सीख जायेंगें .......यह सच है या गलत ....पर धीरे -धीरे मैं तैरना सीख गया ....
बरसात के दिनों में ....हम सभी लडके कुस्ती लड़ने का अभ्यास करते थे ....दुसरे
गाँव का एक नट आता जो हम लडकों को कुस्ती के दावं सिखाता था ......उसको दो वक्त का
खाना मिलता .....और दो महीने के बाद जब जाता .....तब उसे हर घर से अनाज मिलता ...
जिसे वह ,अपने घर ले के जाता था ......मैं बचपने में बहुत तगड़ा था ......अपने दोस्तों को
कुस्ती में हरा देता था ......इसी वजह से मेरे काफी दोस्त बन गये थे ........जो आज तक हैं
आज भी जब गाँव जाता .....सभी मिलते और उस बचपने को याद कर के खूब मजा लेते ...
भागु मेरा सबसे प्रिय दोस्त था .....आज भी वह मेरा दोस्त है .......उसके बाद ,
हिरदय मणि मेरे दोस्त थे ......गाँव में आज उनका एक कालेज है ...जिसके वह प्रिंसपल हैं
फिर राधे का नाम आता है ......हम दोनों बचपन में करेमुं नाम का एक पौधा ...जिसे शहरों
में नारी का साग कहते हैं ...तोड़ने किराहिया नाम का एक तलाब था ,जिसमें जाते थे .....
हम दोनों अपने कपडे उतार के ....तलाब के किनारे रख देते थे ,फिर उस तलाब में उतरते ...
नहाते हुए ....करेमुं का साग तोड़ते ......
आज राधे श्याम मुम्बई शहर में टैक्सी चलाते हैं .......हम लोगों का एक और दोस्त है ,जो
गाँव के कहांर का लडका है ....नाम सुरेस है ......बचपने में हम लोगों को जब दुसरे गाँव से पूड़ी की
दावत मिलती ....यह दावते अक्सर हम पंडितों को मिलती थी .....और रात को यह दावत
होती थी .....हम दोस्त सुरेस को अपने साथ ले लेते थे ....जो जात का पंडित नहीं है ....हम जब
पांत में बैठते ....उसे भी अपने बगल बिठा लेते .....उसके गले में एक जनेऊ डाल देते ,जिससे कोई
उसे ना पहचान नहीं सके ......दोस्तों में यह मेरी जिद्द का नतीजा होता ....सुरेश भी १४ से १५ साल
की उम्र में मुम्बई आ गया था ......एक पान की दूकान पे काम करता था ...कमाठीपुरा में .....२३ या
२४ उम्र में कहीं गायब हो गया .....दस से पंद्रह साल बीत गया ......पत्नी अपने दो बच्चों को ले कर
अपने गाँव चली गयी ...
फिर कई सालों बाद वह अपने गाँव आ गया .......जो उसने बताया वह कमाल का था
उसे मुम्बई में कोई साहब मिले .....जो इसको जर्मनी ले कर गया .....और इतने सालों तक वहीं ही
रहा ...जब मैंने उससे पूछा ....चिट्ठी क्यों नहीं लिखा घर में ......जो उसने बताया .....वह बहुत
अजीब है .....यह उनकी कैद में था ....घर से बाहर तक नहीं निकल सकता था ...
यह कहाँ तक सच है .....मुझे नहीं मालूम ......कुछ साल घर रहा .....फिर मुम्बई आया
और फिर से गायब हो गया .......इसकी पत्नी बच्चे अकेले हो गये ,फिर से ....इसके बेटे को .....
मेरे भाई लखनऊ ले आये ......और हमारे घर पे रहने लगा ....आज वह, यम .बी .एय .कर रहा है
पिता का पता नहीं ,फिर से इस मुम्बई में खो गया ...वह.........!
...
कुछ लोग कहते हैं , वह मछुहारों के मोहल्ले में रहता है .....एक शादी कर ली है ...क्या सच है ...
नहीं मालूम .....
Monday, May 17, 2010
हजपुरा
हजपुरा ..........मेरे गाँव का नाम है .....उत्तर प्रदेश में ...अयोध्या नाम का एक शहर है
उससे चालीस मील पूरब में जिला आंबेडकर नगर है .....कचहरी से जलाल पुर की तरफ
एक सडक जाती है .......उसी सडक पे करीब सोलह मील पे सडक के किनारे ...हजपुरा गाँव
है ......यहीं मैं सन १९४५ में पैदा हुआ था .....जुलाई का महीना था ......उस शाम खूब बारिश
हुई थी ....तारीख थी १७ ...और मैं इस संसार में आया था ॥
मेरा भरा पूरा परिवार था कई दादी थी कई बुआ थीं ....कई बाबा थे दो चाचा थे जो मुझसे
सिर्फ दस बर्ष बड़े थे ,,,,,मेरे दादा जी पैसे वाले थे ......घर का पहला नाती आया था .....खूब ढोल -ताशे बजे
घर में सभी पढ़े - लिखे थे ....दोनों चाचा होस्टल में रह के पढ़ते थे ......मेरे पिता लखनऊ में रेलवे में नौकरी
करते थे .....मेरे दादा भी रेलवे में स्टेशन मास्टर थे .......
मेरे दादा जी के दादा जी ने दो शादियाँ की थी .....पहली शादी से मेरे बाबा जी के पिता थे
सरजू प्रसाद मिश्र थे ......दूसरी शादी से उनकों चार बेटे हुए .....और मैंने बचपने में उनकी पत्नी को देखा था
हम लोग उन्हें बैहरो दद्दी कहते थे .....उनका रंग सावंला था ....काफी बूढी थी ......लेकिन उनके चारो
बेटो को एक -एक बेटी हुई .....लेकिन बेटा नहीं हुआ ........
जब मैं छोटा था .....पूरा परिवार मुझे बहुत प्यार करते थे, दो घर थे .....मैं कभी इस दादी
के साथ खेलता था .....घर के बाहर इतनी चारपाई लगती थी .....जैसा आधा गाँव सो रहा हो .....कभी इस
घर में खाना खाता था ....कभी अपने घर में .......मैं दिप्पन दादी को बहुत प्यार करता था ....वह बहुत सुंदर
थी ....गोरा रंग था उनकों एक बेटी थी उनकी शादी हो गई थी .....एक दूसरी दादी थी उनकों लूटना दादी
कहता था ....उनकों भी एक बेटी थी ....जो मुझसे तीन साल बड़ी थी ...मैं उनके साथ और अपनी बड़ी बहन
के साथ खेलता था ....हमारी एक आम की बाग़ थी ......खूब आम लगते थे उसमें ...
आज जब भी अपना बचपना याद करता हूँ .....एक कहानी की तरह सब कुछ लगता है .......मैंने चलना
कब सीखा मुझे याद नहीं .......माँ मेरी पढ़ी -लिखी नहीं थी ......मैं उनका पहला बेटा था ......मेरी मालिस
करने के लिए .....कौली को रखा था ....जितनी बार कौली मालिश करती ....वह माँ को आ के बताती ...माँ
दीवार पे कोयेले से दीवार पे एक लाईन खींच देती थीं ....और शाम को गिनवाती थी .....
करीब ....दो साल का जब हुआ .....तब मुझे चेचक निकली ....मेरा एक और छोटा भाई हुआ था ...जिसकी
मौत इसी चेचक में हो गयी .....करीब तीन साल का जब हुआ .....हमारे घर में चोरी हुई ......पहली याद
मुझे इसी बात की है ......हमारे घर के आँगन में घुसने के लिए ....तीन दीवालों को छेद करना पड़ता ....गाँव की
भाषा में सेंध लगाना कहते हैं ....इसको
पुलिस आई .......और कुछ नहीं याद है
अपनी बहन के साथ ....गाँव के स्कूल में जाता था ......
दादी मुझे अपनी गोद में ले लेती थी और भैंस का दूध निकालते समय मेरा मुहं ....भैंस के थन से निकलता
हुआ दूध मेरे मुहं की तरफ कर देती थी .......मुंह में गुदगुदी लगती थी ...........
उससे चालीस मील पूरब में जिला आंबेडकर नगर है .....कचहरी से जलाल पुर की तरफ
एक सडक जाती है .......उसी सडक पे करीब सोलह मील पे सडक के किनारे ...हजपुरा गाँव
है ......यहीं मैं सन १९४५ में पैदा हुआ था .....जुलाई का महीना था ......उस शाम खूब बारिश
हुई थी ....तारीख थी १७ ...और मैं इस संसार में आया था ॥
मेरा भरा पूरा परिवार था कई दादी थी कई बुआ थीं ....कई बाबा थे दो चाचा थे जो मुझसे
सिर्फ दस बर्ष बड़े थे ,,,,,मेरे दादा जी पैसे वाले थे ......घर का पहला नाती आया था .....खूब ढोल -ताशे बजे
घर में सभी पढ़े - लिखे थे ....दोनों चाचा होस्टल में रह के पढ़ते थे ......मेरे पिता लखनऊ में रेलवे में नौकरी
करते थे .....मेरे दादा भी रेलवे में स्टेशन मास्टर थे .......
मेरे दादा जी के दादा जी ने दो शादियाँ की थी .....पहली शादी से मेरे बाबा जी के पिता थे
सरजू प्रसाद मिश्र थे ......दूसरी शादी से उनकों चार बेटे हुए .....और मैंने बचपने में उनकी पत्नी को देखा था
हम लोग उन्हें बैहरो दद्दी कहते थे .....उनका रंग सावंला था ....काफी बूढी थी ......लेकिन उनके चारो
बेटो को एक -एक बेटी हुई .....लेकिन बेटा नहीं हुआ ........
जब मैं छोटा था .....पूरा परिवार मुझे बहुत प्यार करते थे, दो घर थे .....मैं कभी इस दादी
के साथ खेलता था .....घर के बाहर इतनी चारपाई लगती थी .....जैसा आधा गाँव सो रहा हो .....कभी इस
घर में खाना खाता था ....कभी अपने घर में .......मैं दिप्पन दादी को बहुत प्यार करता था ....वह बहुत सुंदर
थी ....गोरा रंग था उनकों एक बेटी थी उनकी शादी हो गई थी .....एक दूसरी दादी थी उनकों लूटना दादी
कहता था ....उनकों भी एक बेटी थी ....जो मुझसे तीन साल बड़ी थी ...मैं उनके साथ और अपनी बड़ी बहन
के साथ खेलता था ....हमारी एक आम की बाग़ थी ......खूब आम लगते थे उसमें ...
आज जब भी अपना बचपना याद करता हूँ .....एक कहानी की तरह सब कुछ लगता है .......मैंने चलना
कब सीखा मुझे याद नहीं .......माँ मेरी पढ़ी -लिखी नहीं थी ......मैं उनका पहला बेटा था ......मेरी मालिस
करने के लिए .....कौली को रखा था ....जितनी बार कौली मालिश करती ....वह माँ को आ के बताती ...माँ
दीवार पे कोयेले से दीवार पे एक लाईन खींच देती थीं ....और शाम को गिनवाती थी .....
करीब ....दो साल का जब हुआ .....तब मुझे चेचक निकली ....मेरा एक और छोटा भाई हुआ था ...जिसकी
मौत इसी चेचक में हो गयी .....करीब तीन साल का जब हुआ .....हमारे घर में चोरी हुई ......पहली याद
मुझे इसी बात की है ......हमारे घर के आँगन में घुसने के लिए ....तीन दीवालों को छेद करना पड़ता ....गाँव की
भाषा में सेंध लगाना कहते हैं ....इसको
पुलिस आई .......और कुछ नहीं याद है
अपनी बहन के साथ ....गाँव के स्कूल में जाता था ......
दादी मुझे अपनी गोद में ले लेती थी और भैंस का दूध निकालते समय मेरा मुहं ....भैंस के थन से निकलता
हुआ दूध मेरे मुहं की तरफ कर देती थी .......मुंह में गुदगुदी लगती थी ...........
Monday, April 26, 2010
भौजी
सारा गाँव ,उन्हें भौजी बुलाता था ....यह आज की बात नहीं है । यह दौर है ,
सन पचास से सन साठ का ....अभी कुछ वर्ष पहले देश आजाद हुआ था ।
गरीबी बहुत थी ...दो वक्त का खाना ,नसीब नहीं था ...बच्चे एक लगोंटी में
घूमते थे .....भौजी ही एक ही थी ....जो सभी का ख्याल रखती थीं ....उनके पति
रेलवे में सहायक स्टेशन मास्टर थे .....भौजी के तीन बेटे एक बेटी थी बड़े बेटे भी
रेलवे में नौकरी करते थे ....लखनऊ शहर में ...., छोटे दोनों भाई उनके साथ रह के
पढ़ते थे .....गाँव में खेत थे ....लेकिन सिचाई के साधन नहीं थे ...फसल वगैर पानी
के सूख जाती थी ......
भौजी ही एक थी ....जो गरीबों को धन से अनाज से सहायता करती थी ....किसी
गरीब के घर में शादी ब्याह पड़ा , तो भौजी को सारा इंतजाम करना पड़ता था...गिरधारी
ने अपनी बीबी को निकाल दिया तो ........भौजी ने उसे अपने घर में रख लिया ...उसके बच्चों
का ख्याल रखा .... गरीबी से तंग आ कर किसान शहर की तरफ भागता ....भौजी से किराया लेने आता
भौजी जल्दी पैसा नहीं देती ....उससे पूछती ...ए....निरहू ...तू तो जात हया शहर......यहाँ तोहरे
लडकन का के देखे ......निरहू का एक ही जवाब होता भौजी ....तू हऊ ...न ....और वह
आदमी इतना कह के रोने लगता .....अब भौजी कुछ नहीं बोलती .....और घर में से दस रुपया
निकाल के लाती ....और उसे देती .......उस समय कलकत्ता का किराया ...सात रुपया था
.........निरहू के जाते ....जायर मियां आते ...उनके सर पे एक टोकरी होती ......भौजी के सामने
उतार के रखते ...आमों से भरी टोकरी होती ......गाँव में सबसे पहले ...इनके ही पेड़ के आम
पकते थे .....जायर मियां के बच्चे खाए या ना खाएं ...भौजी के घर आम की टोकरी पहले
आती ....यह वह समय था जब आम बेचने का रिवाज नहीं था .....भौजी की बिटिया की शादी
जमींदार घराने में हुई थी ......आम के सीजन में ....जमींदार साहब आठ से दस टोकरी आमों की
भेजते थे ....जायर मियां की टोकरी घर के अन्दर चली जाती....घर में खाने वाले भौजी नाती पोते
थे ..जो शहर से गर्मिओं की छुट्टी में आते थे ......
जायर मियाँ अपनी टोकरी के इन्तजार में बैठे रहते ......भौजी पूछ लेती ....कोई चीज की
जरूरत तो नहीं है ?........जायर मियाँ धीरे से कह देते ......भौजी यह साल ...सब अरहरिया
झुराय गय.......भौजी समझ गयी ....और घर के अंदर से टोकरी में अरहर की दाल ही
आयी .....और जायर मियां ने टोकरी सर पे रखी ....और अपने घर की तरफ चल दिए
भौजी एक इशारे पे काम करने वालों की लाइन लग जाती थी .....भौजी के पति ने
जितना कमाया ....वह सब गाँव वालों पे लग जाता .....पर उनके पति ने कभी नहीं पूछा
...पैसा कहाँ जाता है ?.......समय के साथ -साथ चीजे बदलने लगी ....भौजी के पति रिटायर
हो कर घर आ गए .....सन सतावन में रिटायर हुए थे .....पति के आ जाने से ....भौजी के बांटने
में थोड़ी कमी जरूर आई .....पर रोब -दाब वही रहा .....उनके पति को सभी दादा जी कहते थे
वो घर के द्वार पे ही बैठे रहते थे ......दादा जी सरकारी नौकरी कर के आये थे ...बात -चीत शहरी
नुमा थी ......गांव के लोग डर के मारे दादा जी से दूर ही भागते थे .... अब गांव वाले भौजी से ......
मिलने पिछवाड़े से आते थे .....और भौजी भी उसी तरह बांटती धन ...अनाज .... ।
भौजी को फालिज का अटैक पड़ा .....वह शहर गयी ....बड़े बेटे के पास वहीं
उनका इलाज होने लगा ......लेकिन उनका एक अंग काम नहीं करता ......यहाँ उनकी बडी बहु
सेवा करती ......चार -छे महीने के बाद .....भौजी गांव जाने की जिद्द करने लगी .....एक दिन
भौजी के बड़े बेटे ने पूछा .....माई घर जा कर क्या करोगी .....यहाँ तो सभी हैं बेटे बहु पोते गांव
में तो कोई नहीं है .......भौजी ने कहा .....हमें तुम लोगों की इतनी मोह नहीं लगती ....जितनी
गांव वालों की याद आती है .....मुझे वहीं भेज दो ......कुछ दिनों बाद भौजी को गांव भेज दिया
गया ......सारा गांव ...उमड़ पड़ा उनकों देखने के लिए .....और अपनी आखरी सांस तक गांव
में ही रहीं ......आज भी .....हर गांव वाला अपनी तकलीफ ले के आता ......और भौजी उसको
पूरा करती ....
भौजी की मौत सन अस्सी में हो गयी .....आज भी गांव में भौजी को लोग याद करते हैं ...हर गांव वाले
के पास अपनी एक कहानी है .....कब -कब भौजी ने उसकी सहायता की थी ......आज भी भौजी
का बनाया हुआ मकान वैसा -का वैसा है ....डेढ़ गजी दीवार आज तक वैसी ही मजबूती से है .....घर के कोठे
सुने पड़े हैं ......कभी अनाज भरा रहता था .......अब सूना है .....उनके नाती पोते शहरों में रहते हैं
गांव की कोई खबर नहीं लेते .......भौजी के ही दान पुन्न से ....नाती पोते बड़े -बड़े साहब बन गए ..पर
......आम की बगिया सुनी पड़ी है ......खेत ...भौजी को सोच सोच के रोते हैं .......नहीं तो उनका
पैदा किया हुआ अनाज भूखों के पेट तक जाता था .......अब कहाँ जाता है किसो क्या मालूम
.........एक दिन जरूर आएगा ....किसी को भौजी का अंस मिले गा ....और अपने गांव की सेवा
करेगा .......
सन पचास से सन साठ का ....अभी कुछ वर्ष पहले देश आजाद हुआ था ।
गरीबी बहुत थी ...दो वक्त का खाना ,नसीब नहीं था ...बच्चे एक लगोंटी में
घूमते थे .....भौजी ही एक ही थी ....जो सभी का ख्याल रखती थीं ....उनके पति
रेलवे में सहायक स्टेशन मास्टर थे .....भौजी के तीन बेटे एक बेटी थी बड़े बेटे भी
रेलवे में नौकरी करते थे ....लखनऊ शहर में ...., छोटे दोनों भाई उनके साथ रह के
पढ़ते थे .....गाँव में खेत थे ....लेकिन सिचाई के साधन नहीं थे ...फसल वगैर पानी
के सूख जाती थी ......
भौजी ही एक थी ....जो गरीबों को धन से अनाज से सहायता करती थी ....किसी
गरीब के घर में शादी ब्याह पड़ा , तो भौजी को सारा इंतजाम करना पड़ता था...गिरधारी
ने अपनी बीबी को निकाल दिया तो ........भौजी ने उसे अपने घर में रख लिया ...उसके बच्चों
का ख्याल रखा .... गरीबी से तंग आ कर किसान शहर की तरफ भागता ....भौजी से किराया लेने आता
भौजी जल्दी पैसा नहीं देती ....उससे पूछती ...ए....निरहू ...तू तो जात हया शहर......यहाँ तोहरे
लडकन का के देखे ......निरहू का एक ही जवाब होता भौजी ....तू हऊ ...न ....और वह
आदमी इतना कह के रोने लगता .....अब भौजी कुछ नहीं बोलती .....और घर में से दस रुपया
निकाल के लाती ....और उसे देती .......उस समय कलकत्ता का किराया ...सात रुपया था
.........निरहू के जाते ....जायर मियां आते ...उनके सर पे एक टोकरी होती ......भौजी के सामने
उतार के रखते ...आमों से भरी टोकरी होती ......गाँव में सबसे पहले ...इनके ही पेड़ के आम
पकते थे .....जायर मियां के बच्चे खाए या ना खाएं ...भौजी के घर आम की टोकरी पहले
आती ....यह वह समय था जब आम बेचने का रिवाज नहीं था .....भौजी की बिटिया की शादी
जमींदार घराने में हुई थी ......आम के सीजन में ....जमींदार साहब आठ से दस टोकरी आमों की
भेजते थे ....जायर मियां की टोकरी घर के अन्दर चली जाती....घर में खाने वाले भौजी नाती पोते
थे ..जो शहर से गर्मिओं की छुट्टी में आते थे ......
जायर मियाँ अपनी टोकरी के इन्तजार में बैठे रहते ......भौजी पूछ लेती ....कोई चीज की
जरूरत तो नहीं है ?........जायर मियाँ धीरे से कह देते ......भौजी यह साल ...सब अरहरिया
झुराय गय.......भौजी समझ गयी ....और घर के अंदर से टोकरी में अरहर की दाल ही
आयी .....और जायर मियां ने टोकरी सर पे रखी ....और अपने घर की तरफ चल दिए
भौजी एक इशारे पे काम करने वालों की लाइन लग जाती थी .....भौजी के पति ने
जितना कमाया ....वह सब गाँव वालों पे लग जाता .....पर उनके पति ने कभी नहीं पूछा
...पैसा कहाँ जाता है ?.......समय के साथ -साथ चीजे बदलने लगी ....भौजी के पति रिटायर
हो कर घर आ गए .....सन सतावन में रिटायर हुए थे .....पति के आ जाने से ....भौजी के बांटने
में थोड़ी कमी जरूर आई .....पर रोब -दाब वही रहा .....उनके पति को सभी दादा जी कहते थे
वो घर के द्वार पे ही बैठे रहते थे ......दादा जी सरकारी नौकरी कर के आये थे ...बात -चीत शहरी
नुमा थी ......गांव के लोग डर के मारे दादा जी से दूर ही भागते थे .... अब गांव वाले भौजी से ......
मिलने पिछवाड़े से आते थे .....और भौजी भी उसी तरह बांटती धन ...अनाज .... ।
भौजी को फालिज का अटैक पड़ा .....वह शहर गयी ....बड़े बेटे के पास वहीं
उनका इलाज होने लगा ......लेकिन उनका एक अंग काम नहीं करता ......यहाँ उनकी बडी बहु
सेवा करती ......चार -छे महीने के बाद .....भौजी गांव जाने की जिद्द करने लगी .....एक दिन
भौजी के बड़े बेटे ने पूछा .....माई घर जा कर क्या करोगी .....यहाँ तो सभी हैं बेटे बहु पोते गांव
में तो कोई नहीं है .......भौजी ने कहा .....हमें तुम लोगों की इतनी मोह नहीं लगती ....जितनी
गांव वालों की याद आती है .....मुझे वहीं भेज दो ......कुछ दिनों बाद भौजी को गांव भेज दिया
गया ......सारा गांव ...उमड़ पड़ा उनकों देखने के लिए .....और अपनी आखरी सांस तक गांव
में ही रहीं ......आज भी .....हर गांव वाला अपनी तकलीफ ले के आता ......और भौजी उसको
पूरा करती ....
भौजी की मौत सन अस्सी में हो गयी .....आज भी गांव में भौजी को लोग याद करते हैं ...हर गांव वाले
के पास अपनी एक कहानी है .....कब -कब भौजी ने उसकी सहायता की थी ......आज भी भौजी
का बनाया हुआ मकान वैसा -का वैसा है ....डेढ़ गजी दीवार आज तक वैसी ही मजबूती से है .....घर के कोठे
सुने पड़े हैं ......कभी अनाज भरा रहता था .......अब सूना है .....उनके नाती पोते शहरों में रहते हैं
गांव की कोई खबर नहीं लेते .......भौजी के ही दान पुन्न से ....नाती पोते बड़े -बड़े साहब बन गए ..पर
......आम की बगिया सुनी पड़ी है ......खेत ...भौजी को सोच सोच के रोते हैं .......नहीं तो उनका
पैदा किया हुआ अनाज भूखों के पेट तक जाता था .......अब कहाँ जाता है किसो क्या मालूम
.........एक दिन जरूर आएगा ....किसी को भौजी का अंस मिले गा ....और अपने गांव की सेवा
करेगा .......
Wednesday, April 21, 2010
माँ
सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था ,एक दिन पंडित जी का जवान बेटा गुज़र गया ,
बहुत बड़ी खेती थी ...अब उसे कौन देखेगा ? यही विचार उनके मन में गूंज रही थी ,
खुद भी साठ से ऊपर हो चुके थे ....उनका वंस कैसे चले गा ? बेटे के अचानक गुजर
जाने से ....उसकी पत्नी पेट से जरुर थी ....बेटे के इस तरंह गुजर जाने से ....पंडित जी
की पत्नी ....अपने आप को नहीं सभाल पायी ...और आठवे महीने में ही ....बच्चे को जन्म
दे दिया ......एक आस थी ...वंस चलने की , लगता था ....वह भी नहीं पूरा अब होगा ।
लेकिन जब दाई ने आ के बताया ...बेटा हुआ ...और ठीक हैं जच्चा और बच्चा । यह सुन कर
पंडित जी .....की खुशी सातवें आसमान जा पहुंची .....अब उनका वंस चल जाएगा .....
गाँव भर के लोगों को .....दावत दी गयी ....नाच गाना हुआ ...घर में भरा अनाज
गाँव भर बांटा गया ....बेटे के गुजरने का गम थोड़ा कम हुआ ....एक आश जगी, आने वाले कल की
उन्होंने बेटे का नाम भी सोच भी लिया .....हिरदय मड़ी ......सब कुछ तो ठीक था ....लेकिन
बच्चा... दूध माँ का नहीं पी पा रहा था .....दाई ने पंडित जी को आ कर बताया ....माँ का दूध
सूख गया है ....दाई ने कहा ...गाय का दूध पिलाने की कोशिश की लेकिन वह भी नहीं पी रहा है
अब एक ही रास्ता है ,.......किसी औरत का ही दूध पिलाया जाय......! पंडित जी
यह सुन कर कुछ समझ नहीं पाए .....दाई को कहा ....मुझे कुछ नहीं मालूम ...मेरे पोते को कुछ
नहीं होना चाहिए ।
दाई ने कहा ........अब एक ही रास्ता है .....हरखुआ की मेहरारू को बच्चा हुआ है
अब आप ही बताओ ...क्या किया जाय ....पंडित जी बोल पड़े .....हमार पोता हरखुआ की
मेहरारू का दूध पियेगा .....? गाँव छोटा था पाँच घर पंडितों का था ....दो घर बनिओं का था
और रहने वाले लोग गाँव के भर जात के थे ......और हरखुआ भर ही था ...
रात दूसरा पहर बीत रहा था .....पंडित जी का पोता .....भूख के मारे रोता ही जा रहा था
......छोटा सा गाँव था .....पंडित जी पोते की बात....सभीको पता लग गयी थी ...माँ का दूध
सूख गया है ....और पंडित जी एक भरिन के शरीर का दूध कैसे पिलायेंगें ?......गांव के बूढे -बुजूर्ग ,पंडित जी के घर के सामने इकठा हो गये थे .....सभी का यही कहना था .....हरखुआ के घर की गाय का
दूध आप पी लेंगे ... ब्च्चुआ को पिला देगें ...पर ओकर मेहरारू का दूध काहे नहीं .....?
हरखुआ की मेहरारू को बुलाया गया .....और पंडित जी के वंस को पालने के लिए
भ रिन ने अपना दूध पिलाया बच्चा चुप हो गया ....साल भर तक वह औरत पंडित जी के
पोते दूध पिलाती रही ....उसका बेटा ज्यादा दूध नहीं पी पाता था...हरखुआ का बच्चा बीमार
रहने लगा ......अब पंडित जी का बेटा .....ऊपर का दूध पीनेलगा ....और अब पंडित जी ...
पोते को ...हरखुआ के घर नहीं भेजते थे ........
इसी बीच गाँव में चेचक का रोग फ़ैल गया ....राम मिलन को भी चेचक निकली .....
और वह नहीं बच पाया ...माँ की कोख सुनी हो गयी .....वह रोई ......बहुत रोई ....उस बच्चे
को देखना चाहती थी ....जिसे उसने दूध पिलाया था ......पर पंडित जी ने ....उस दुखी माँ के
पास अपने पोते को नहीं भेजा .....
..........पंडित जी नहीं चाहते थे .....उनके पोते को किसी की नजर न लगे .....वही उनके वंस को चलाने
वाला था ....धीरे -धीरे समय बीतने लगा बच्चा पाँच वर्ष का हो गया ......इसी बीच पंडित जी
की बहु का देहांत हो गया .....यह सब देख कर बच्चा बहुत सहम गया ....और उस दूध पिलाने वाली
माँ के पास आ गया । हरखुआ की बीबी यह देख कर बहुत खुश हुई ..बहुत अर्से बाद माँ की मुराद पूरी.हुई ..पंडित जी अब हार गये .....उनका पोता फिर से वहीं पलने लगा ...बस थोड़ी देर के लिए अपने घर
एक दूध पिलाने वाली माँ को अपना बेटा मिल गया ...उसका दर्द कुछ कम हुआ ..........
समय के साथ हिरदय मड़ी बड़ा हो गया .....उसके दादा जी भी गुजर गये
......और अपनी दूध पिलाने वाली माँ के साथ रहने लगा ....समय के साथ -साथ
हिरदय मणीकी शादी हो गयी ....उसके अपने बच्चे होगये ..हरखुआ भी मर गया .हिरदय मड़ी ....
उस बूढी माँ को अपने घर ले आया .........जो पत्नी को अच्छा नहीं लगा .....
पति ने सारी कहानी बताई .....उसे जीवन देने वाली औरत उसकी माँ नहीं ...यह औरत है
.....कैसा उसका बचपना बीता......पत्नी... पति के दर्द को नहीं समझ पायी
.............पत्नी ....माँ के प्यार को बर्दाश नहीं कर पायी .....बूढी माँ ....एक दिन घर के कुएं
में गिर के मर गयी ......बेटा इस हादसे को जान गया था .....किसी से कुछ नहीं कहा और एक
शाम ......उसने सोचा वंस चलने के लिए दो बेटे थे ! .......अपने बाबा को दिया वादा पूरा
कर दिया था .....और घर छोड़ के कहाँ चला गया ,किसी को कुछ नहीं मालूम ......
बहुत बड़ी खेती थी ...अब उसे कौन देखेगा ? यही विचार उनके मन में गूंज रही थी ,
खुद भी साठ से ऊपर हो चुके थे ....उनका वंस कैसे चले गा ? बेटे के अचानक गुजर
जाने से ....उसकी पत्नी पेट से जरुर थी ....बेटे के इस तरंह गुजर जाने से ....पंडित जी
की पत्नी ....अपने आप को नहीं सभाल पायी ...और आठवे महीने में ही ....बच्चे को जन्म
दे दिया ......एक आस थी ...वंस चलने की , लगता था ....वह भी नहीं पूरा अब होगा ।
लेकिन जब दाई ने आ के बताया ...बेटा हुआ ...और ठीक हैं जच्चा और बच्चा । यह सुन कर
पंडित जी .....की खुशी सातवें आसमान जा पहुंची .....अब उनका वंस चल जाएगा .....
गाँव भर के लोगों को .....दावत दी गयी ....नाच गाना हुआ ...घर में भरा अनाज
गाँव भर बांटा गया ....बेटे के गुजरने का गम थोड़ा कम हुआ ....एक आश जगी, आने वाले कल की
उन्होंने बेटे का नाम भी सोच भी लिया .....हिरदय मड़ी ......सब कुछ तो ठीक था ....लेकिन
बच्चा... दूध माँ का नहीं पी पा रहा था .....दाई ने पंडित जी को आ कर बताया ....माँ का दूध
सूख गया है ....दाई ने कहा ...गाय का दूध पिलाने की कोशिश की लेकिन वह भी नहीं पी रहा है
अब एक ही रास्ता है ,.......किसी औरत का ही दूध पिलाया जाय......! पंडित जी
यह सुन कर कुछ समझ नहीं पाए .....दाई को कहा ....मुझे कुछ नहीं मालूम ...मेरे पोते को कुछ
नहीं होना चाहिए ।
दाई ने कहा ........अब एक ही रास्ता है .....हरखुआ की मेहरारू को बच्चा हुआ है
अब आप ही बताओ ...क्या किया जाय ....पंडित जी बोल पड़े .....हमार पोता हरखुआ की
मेहरारू का दूध पियेगा .....? गाँव छोटा था पाँच घर पंडितों का था ....दो घर बनिओं का था
और रहने वाले लोग गाँव के भर जात के थे ......और हरखुआ भर ही था ...
रात दूसरा पहर बीत रहा था .....पंडित जी का पोता .....भूख के मारे रोता ही जा रहा था
......छोटा सा गाँव था .....पंडित जी पोते की बात....सभीको पता लग गयी थी ...माँ का दूध
सूख गया है ....और पंडित जी एक भरिन के शरीर का दूध कैसे पिलायेंगें ?......गांव के बूढे -बुजूर्ग ,पंडित जी के घर के सामने इकठा हो गये थे .....सभी का यही कहना था .....हरखुआ के घर की गाय का
दूध आप पी लेंगे ... ब्च्चुआ को पिला देगें ...पर ओकर मेहरारू का दूध काहे नहीं .....?
हरखुआ की मेहरारू को बुलाया गया .....और पंडित जी के वंस को पालने के लिए
भ रिन ने अपना दूध पिलाया बच्चा चुप हो गया ....साल भर तक वह औरत पंडित जी के
पोते दूध पिलाती रही ....उसका बेटा ज्यादा दूध नहीं पी पाता था...हरखुआ का बच्चा बीमार
रहने लगा ......अब पंडित जी का बेटा .....ऊपर का दूध पीनेलगा ....और अब पंडित जी ...
पोते को ...हरखुआ के घर नहीं भेजते थे ........
इसी बीच गाँव में चेचक का रोग फ़ैल गया ....राम मिलन को भी चेचक निकली .....
और वह नहीं बच पाया ...माँ की कोख सुनी हो गयी .....वह रोई ......बहुत रोई ....उस बच्चे
को देखना चाहती थी ....जिसे उसने दूध पिलाया था ......पर पंडित जी ने ....उस दुखी माँ के
पास अपने पोते को नहीं भेजा .....
..........पंडित जी नहीं चाहते थे .....उनके पोते को किसी की नजर न लगे .....वही उनके वंस को चलाने
वाला था ....धीरे -धीरे समय बीतने लगा बच्चा पाँच वर्ष का हो गया ......इसी बीच पंडित जी
की बहु का देहांत हो गया .....यह सब देख कर बच्चा बहुत सहम गया ....और उस दूध पिलाने वाली
माँ के पास आ गया । हरखुआ की बीबी यह देख कर बहुत खुश हुई ..बहुत अर्से बाद माँ की मुराद पूरी.हुई ..पंडित जी अब हार गये .....उनका पोता फिर से वहीं पलने लगा ...बस थोड़ी देर के लिए अपने घर
एक दूध पिलाने वाली माँ को अपना बेटा मिल गया ...उसका दर्द कुछ कम हुआ ..........
समय के साथ हिरदय मड़ी बड़ा हो गया .....उसके दादा जी भी गुजर गये
......और अपनी दूध पिलाने वाली माँ के साथ रहने लगा ....समय के साथ -साथ
हिरदय मणीकी शादी हो गयी ....उसके अपने बच्चे होगये ..हरखुआ भी मर गया .हिरदय मड़ी ....
उस बूढी माँ को अपने घर ले आया .........जो पत्नी को अच्छा नहीं लगा .....
पति ने सारी कहानी बताई .....उसे जीवन देने वाली औरत उसकी माँ नहीं ...यह औरत है
.....कैसा उसका बचपना बीता......पत्नी... पति के दर्द को नहीं समझ पायी
.............पत्नी ....माँ के प्यार को बर्दाश नहीं कर पायी .....बूढी माँ ....एक दिन घर के कुएं
में गिर के मर गयी ......बेटा इस हादसे को जान गया था .....किसी से कुछ नहीं कहा और एक
शाम ......उसने सोचा वंस चलने के लिए दो बेटे थे ! .......अपने बाबा को दिया वादा पूरा
कर दिया था .....और घर छोड़ के कहाँ चला गया ,किसी को कुछ नहीं मालूम ......
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