Thursday, September 17, 2026

आज फिर जीने की तमन्ना है




 कुछ मौसम इस तरह का था,कुछ कहने का मन हो रहा था

चलो इक बार अजनबी बन जाए 

जब कुछ समझ ना आ रहा हो ,तो किसी नामचीन शायर की नज्म उठा लो,

हमेसा जो सभी कहते हैं ,वह नहीं कहना चाहिए, 

इक बार, रास्ता मुझसे खो गया 

मैं अनजाने राह पर चल दिया ,

इस भटाकाव ,इक अजनबी मोहतरमा मिल गई, 

कहने लगी हमारे साथ चलो ,मैं इक राह हूँ 

भटकना मुझे मंजूर था किसी अनजाने का साथ 

आज भी भटक रहा हूँ,समय के साथ मैं फकीर हो गया

श्लोका

 सब से सुंदर  ,मेरी पोती है,वह अपने पापा पे हूबहू गई है ,वैसी ही शैतानी करती है जैसे रविश बचपन में करता था ,मुझे वह बाबू जी कह के बुलाती है ,कहाँ से सीखा किससे जाना नहीं मालूम,लेकिन मुझे अच्छा लगता है,मैं अपने बचपने में ,पिता जी को बाबू जी कहता था ,हमारा साथ बहुत जल्दी छोड़ के चले गए, सिर्फ बावन साल की उम्र में कहीं अधूरा प्यार उनका था हमारे लिए वह अधूरा ही रह गया ।