Sunday, September 27, 2026

वो सर्द रात

 रात का कोई एक बज रहा था ,जनवरी माह था ,आँखों

में नींद नदारत थी ,रजाई से बाहर निकला ,ठण्ड पर नज़र 

डाली अरगनी पर लटका कोट पहन लिया । घर से बाहर आया

ठंडी हवा मेरे कानो को चुमने लगी,मफलर से कान ढक लिया,

कहाँ जा रहा था मुझे नहीं मालूम बस चलता जा रहा था ।

      कुछ देर बाद महसूस हुआ, मैं उसके घर के सामने खड़ा था

न वह मुझे जानती थी और ना मैं ,फिर खुद से पूछा भाई यहाँ कैसे?

कोई जवाब नहीं ,कुछ सोच कर उसके घर की बाल्कनी, में देखा

 वही साल ओढ़े खड़ी है ,और सड़क पे मुझे देख रही है ।

    मुझे नींद ना आने की वजह समझ आ गई ।




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