Thursday, April 1, 2010

सत्तू

........अब मेरी , ख़ास इज्जत होने लगी ,ज़ेबा जी के स्टाफ में

करीब दस रोज हो चुका था ,उनके साथ काम करते हुए । मैं जानता

था ,मुझ पे इतना सब खर्च जो हो रहा है ....उसके पीछे कुछ न कुछ ,

कोई बात जरुर है ,हीरो खान के साथ एक फिल्म थी जो पूरी हो गयी है

.....उस दिन ,जब मुझे पता चला की अब हीरो खान के साथ कोई फिल्म

नहीं है । तब मैंने ज़ेबा जी से कहा ....मेडमजी अब आप खान के साथ कोई

फिल्म मत साइन करें ........यह सुनते ही वह बोल पड़ी ....पर तुम्हारा काम

अभी ख़तम नहीं हुआ ....जो कुछ भी खान भाई जान ने, तुमसे कहा है .....वह तो तुम्हे

करना ही होगा ......! यह सुन कर ...मुझे समझ आ गया , कितनी नफरत करती हैं

हीरो खान से .....

इसी बीच बिरजू ...ज़ेबा जी को कह के गावं चला गया .....मैं बिलकुल अकेला रह गया

इस मुम्बई शहर में ....दिन यूँ कटने लगा ....जैसे बेवजह जिए जा रहा हूँ .....भाग भी नहीं

सकता था ....इनके चक्रव्यूह में यूँ फंस गया ....की अब मौत ही अपना आखरी इलाज लगने लगा

.........एक रोज ज़ेबा जी कर्जत में शूटिंग कर रही थी ,मैं भी साथ था ....और रात को ठहरने के लिए

खंडाला के एक बंगले में इंतजाम था ......पर उस बंगले में हम लोगों को रुकने की इज्जाजत नहीं

थी .....आज पहला दिन था शूटिंग का .......फिल्म नई थी, हीरो नया उभरता हुआ था ...

शूटिंग पे मेरा काम सिर्फ यह होता ....मैं साए की तरह ज़ेबा जी के साथ रहूँ ......बस एक रखवाले

की तरह .....जैसे गाँव में लोग अपनी आम की बगिया रखाने के लिए रखवाला रख लेते हैं

कोई एक आम न तोड़ने पाए ....बस मेरा भी वही हाल था ...

हथियार के नाम पे ....मुझे ज़ेबा जी ने एक पिस्तौल दे रखी थी ...उसे कब और किस पर

चलाना होगा ,वह भी वही बतायेंगी .....अब तो बड़े -बड़े निर्माता मुझे भी सलाम करते ...निर्देशक

ज़ेबा जी के बारे में .....कोई डेट चाहिए उसके बारे में मुझसे बात करता ....

दिन पर दिन मैं जेवा जी के करीब इतना आगया की उनके साथ बैठ कर खाना भी खाता ...


खान का बदला धीरे - धीरे धूमिल होने लगा ....अब तो उसका जिक्र भी नहीं होता ...जैसे भूल सी

गयी हों ......मुझे लोग शक की निगाह से देखने लगे ....मैं हूँ कौन ....?

उस रात ज़ेबा जी जब खंडाला के बंगले में अकेले रुकी थी ......मुझसे कहा था ...मैं बंगले

के बाहर रात भर मेरी ड्यूटी करूं .....किसी वक्त भी वह मुझे अंदर बुला सकती हैं,खतरा होने पे

उस रात , मैं बंगले से कुछ दुरी पे एक मंदिर के चबूतरे पे बैठा रहा ......हनुमान जी

का छोटा सा मंदिर था ..... माँ ने बचपन में हनुमान चालिसा याद करा दिया था..........

बस वही पढ़ता रहा ....उस रात मैंने कुछ खाया भी नहीं था .....भूख तो डर के मारे भाग

गयी थी । करीब रात के तीन बजे , ज़ेबा जी का फोन आया .....बंगले के पिछवाड़े आवो

मैं अँधेरे में रास्ता खोजता हुआ ......बंगले के पीछे के हिस्से में पहुंचा ....ज़ेबा जी ने एक दरवाजा खोला

और मुझे अंदर चलने को कहा ........बंगले में सभी लोग सो चुके थे ......मुझे एक कमरे में ले कर गयी

....मुझे डर लगने लगा ....यह मुझसे क्या चाहती हैं ?....बिस्तर खाली था .....मुझे बैठने को कहा

उन्होंने इत्मीनान की साँस ली ....मेरी तरफ देखा ...और कहने लगी ......जो काम तुम्हारा था

वह मैंने कर दिया है ,बिस्तर के नीचे एक सूटकेश है ....इसे तुम्हे ले कर जाना होगा ...

और ठीकाने लगाना होगा .....इसमें एक लाश है .......और लाश है ...मेरे भाई जान की ...हीरो खान की

नहीं ...मुझे बहुत दिनों से ठग रहे थे ....

मैं हीरो खान से प्यार करती हूँ .....और मुझे डर था ....कहीं तुम मेरे प्यारको मार ना डालो ।

आज तक जीतनी घटनाएं हुई हैं .......वह सब डान की ही पैदा की हुई थी .....अब इस सूटकेश

को ले और कहीं दूर फेंक कर आ जाओ .........

मैंने सूटकेश लिया ......और बंगले से बाहर आया ...... सर पे रख के चल दिया......कहाँ जाऊं ?

मैं इतना डरा हुआ था ......क्या करूं इस सूटकेश का ,पकड़ा गया ......तो जिन्दगी भर

की कैद भोगनी पड़ेगी ......मैं जब रेलवे लाइन पार कर रहा था .......तभी एक माल गाडी मेरे

सामने से गुजरी .....और कुछ दूरी पे जा कर रुक गयी ......गाडी इतनी लम्बी थी .....अब पार कैसे जाऊं

.......यही सब सोचता रहा ......सूटकेश को जमीन पे रख दिया था ......गाड़ी खडी रही ....

और मैं भी इसी इन्तजार में , गाडी जाये तो मैं भी पार जाऊं .......पुरी गाडी में कोयला भरा हुआ था

मेरे मन में एक बात आयी , क्यों ना मै इस सूटकेश को ....इस माल गाडी पे डाल दूँ .....पर इतना

भारी था सूटकेश, की मैं उसे अकेले माल गाडी पे डाल नहीं सकता था ......फिर भी हिम्मत की ...

और हनुमान जी का नाम लिया .....और फेंक दिया .....और खुद भी गाडी पे चढ़ के ...सूटकेश को

ठीक से रख दिया ......फिर ट्रेन धीरे - धीरे रेंगने लगी .......मैं ट्रेन पे बैठा ही रहा ......सोचा छोड़

दो इस शहर को .......कुछ नहीं है इस मुम्बई में ......दुखों का पिटारा है ....कौन किसको कैसे ठग

रहा है ... किसी को नहीं मालूम ......रात भर जगा हुआ था .....उन्हीं कोयलों के ढेर पे कब नीद

लग गयी पता ही नहीं चला ......

और कब तक सोया रहा ......जब आँख खुली तो मै ...कोयलों पे अकेला लेटा हुआ था ...

लगता है कोई चोर चुरा ले गया उस सूटकेश को ......अच्छा ही हुआ ....मेरे गले का बवाल गया

.............आज मैं साठ साल का हो गया ......अपने गाँव में हूँ ......फिल्म की हर किताब ,

पेपर पढ़ता हूँ ......जिसमें ज़ेबा जी के बारे में लिखा होता है ....थोड़ी सी खेती है ...उसी पे जीवित हूँ

पर बहुत खुश हूँ ......बिरजू अब नहीं रहा ......उसके बच्चे हैं ....उनका भी मैं ही ख्याल रखता हूँ

शादी नहीं की .......मुझे ज़ेबा जैसी कोई नहीं मिली ......और अंदर एक डर आज तक बैठा है

मैं भी भाई जान के खून में शामिल था ........?





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